RPS-2020 CGPSC MAINS WRITING PRACTICE 26 MAY ANSWER

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उत्तर1 एक अर्वाचीन समाजशास्त्रीय कृति में धर्म को परिभाषित करते हुए कहा है कि धर्म विश्वासों प्रतीकों मूल्यों एवं क्रियाओं की संस्थायीकृत प्रणाली है जो मनुष्यों के समूह को अपने परम जीवन के प्रश्नों का समाधान प्रदान करती है। सभी धर्मों में एक सामान्य विशेषता यह है कि वह जीवन की जटिलताओं उसके रहस्यों की ओर मनुवृतियों एवं भावनात्मक अनुभूतियों में मिश्रण का प्रतिनिधित्व करते हैं।


उत्तर2 धर्म का स्वरूप
धर्म ने मनुष्य के भौतिक व सामाजिक पर्यावरण की शक्तियों के साथ उसके संबंधों को नियंत्रित तथा उनकी व्याख्या करने का प्रयास करता है। इन शक्तियों के प्रति मनुष्य के संबंधों की व्याख्या ने धर्म के कुछ रूप जैसे- टोटमवाद, जादू, अंधविश्वास, आत्मवाद आदि को जन्म दिया। इन की संक्षिप्त व्याख्या निम्न है-
1)जड़ देवतावाद- यह धर्म की सर्वाधिक प्रारंभिक रूप है। यह भौतिक वस्तुओं को उनकी रहस्यमई शक्तियों के कारण पूजा है 2)टोटमवाद के अंतर्गत कोई जाति स्वयं को किसी वस्तु से संबंध मानती है जिस वस्तु के प्रति श्रद्धा भाव होता है
3) अंधविश्वास एक दृढ़ विश्वास है की किन्ही कारणों के घटित हो जाने से कोई घटना होगी यद्यपि ऐसे कारणों का घटना से कोई संबंध नहीं होता।
4)जादू- जादू उस शक्ति विशेष का नाम है जिससे अति माननीय जगत पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सके उसकी क्रियाओं को अपनी इच्छा अनुसार भले बुरे शुभ अशुभ में लाया जा सके।
5) आत्मवाद- किसी जीवित प्राणी के भीतर किसी पराभौतिक वस्तु की अवस्थिति में विश्वास है।
धर्म प्रायः सभी समाज में विद्यमान हैं परंतु धार्मिक विश्वास एवं क्रियाएं अनंत एवं विभिन्न है।


उत्तर3 आश्रम व्यवस्था उस सुनियोजित योजना का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें व्यक्ति के जीवन को क्रमबद्ध चार भागों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ,सन्यास) में विभक्त कर ज्ञान प्राप्ति, सांसारिक सुख भोग, ईश्वरीय ज्ञान व आराधना तथा सांसारिक बंधनों को त्याग कर ईश्वरी चिंतन में लीन होकर मोक्ष प्राप्त करता है।
भारतीय समाज में व्यवस्था और संगठन की दृष्टि से प्राचीन काल से ही श्रम विभाजन का महत्व रहा है सामाजिक जीवन की व्यवस्था को जिस प्रकार चार वर्ण( ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य ,शूद्र), चार पुरुषार्थ (धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष) में विभक्त किया है उसी प्रकार संपूर्ण जीवन को चार आश्रम( ब्रह्मचर्य, गृहस्थ,वानप्रस्थ, सन्यास) में बांटा गया है सामान्यतः जीवन को औसत 100 वर्ष मानकर प्रत्येक के लिए 25 वर्ष निर्धारित किया है।
1) ब्रह्मचारी आश्रम जीवन के सभी संयमो जैसे- पवित्रता, अनुशासन, कर्तव्य एवं नैतिकता,आचरण की शुद्धता,सदाचार तथा योग के माध्यम से श्रेष्ठ नागरिक बनने का प्रयास करता था ।
2) गृहस्थाश्रम सर्वाधिक महत्वपूर्ण आश्रम था इसमें व्यक्ति तप त्याग और कर्म का प्रतीक था।
3) वानप्रस्थ आश्रम में व्यक्ति 50 वर्ष के पश्चात वन की ओर प्रस्थान करता था यहां व्यक्ति के इंद्रियों पर नियंत्रण , समता का भाव, पवित्र जीवन तथा अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति का महत्व था
4) सन्यास आश्रम – यहां व्यक्ति जीवन के अंतिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ प्राप्ति के लिए ईश्वर के प्रति अपने प्राणों मोह माया तथा भावनाओं का त्याग कर ईश्वर में लीन होता था


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